चंडीगढ़। हरियाणा के चुनावी रण में उतरे सभी राजनीतिक दलों की नजर प्रदेश के दलित मतदाताओं की तरफ है। पिछले चुनाव में भी दलित और पिछड़ा वर्ग के गठबंधन बनते रहे हैं। किसी समय में प्रदेश के दलित मतदाता एक तरफा बहुजन समाज पार्टी के साथ खड़े दिखाई देते थे। परिणाम स्वरूप बसपा का यहां से सांसद भी बन चुका है और विधायक भी रहे चुके हैं।
भाजपा कर चुकी है दलित सम्मेलन
कांग्रेस फिर से उठाएगी संविधान बचाओ का मुद्दा
जेजेपी ने आसपा तो इनेलो ने बसपा से किया गठबंधन
अब बदले हुए हालातों में पिछले कुछ चुनावों से दलित मतदाता हर बार बदलता रहा है। निकट भविष्य में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने दलित मतदाताओं पर नजर टिका ली है। हरियाणा की राजनीति में मंगलवार को हुए नए गठबंधन से भले ही सत्ता की सीढ़ी अभी दूर हो लेकिन चुनाव में यह गठबंधन राजनीतिक समीकरणों को बिगाडऩे में अहम भूमिका निभाएगा। प्रदेश के सभी राजनीतिक दल राज्य के 21 फीसदी दलित मतदाओं को रिझाने में लगे हुए हैं।
हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान यह मतदाता करीब एक दशक बाद दोबारा कांग्रेस की तरफ चले गए थे। जिसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने हालही में कुरुक्षेत्र में राज्य स्तरीय दलित सम्मेलन का आयोजन करके दलितों को दोबारा अपने साथ जोडऩे का प्रयास किया है। इस चुनाव के दौरान भाजपा प्रदेश के दलितों को यह बताने में लगी हुई है कि दस वर्ष के कार्यकाल के दौरान उनके हित में क्या क्या फैसले लिए गए हैं। वहीं विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा लोकसभा की तर्ज पर इस चुनाव में भी संविधान बचाओ का नारा देते हुए दलितों को अपने समर्थन में लामबंद किया जाएगा।
हरियाणा की राजनीति में हाशिए पर चल रहा इंडियन नेशनल लोकदल पहले ही बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर चुका है। इनेलो व बसपा के गठबंधन को जिस तरह से जाट व दलित के गठजोड़ के रूप में पेश किया गया, उसी तरह से जजपा व आसपा के गठबंधन को भी जाट व दलित के गठबंधन के रूप में पेश किया जा रहा है। चंद्रशेखर रावण भीम आर्मी के भी चीफ हैं। हरियाणा में 21 प्रतिशत के आसपास दलित वोट हैं, जो किसी भी राजनीतिक दल की हार-जीत में अहम भूमिका निभाते हैं।
विधानसभा की 17 सीटें आरक्षित हैं, जिनमें मुलाना, साढ़ोरा, शाहाबाद, गुहला-चीका, नीलोखेड़ी, इसराना, खरखौदा, नरवाना, कालांवाली, रतिया, उकलाना, बवानीखेड़ा, झज्जर, कलानौर, बावल, पटौदी और होडल सीटें शामिल हैं। हरियाणा की 35 विधानसभा सीटों पर दलित मतदाताओं का प्रभाव रहता है। जजपा का लक्ष्य इन्हीं सीटों पर है। जिससे वह 2019 की तरह हरियाणा में किंगमेकर की भूमिका में आ सके। पांच साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में जजपा को जाट और दलितों का अच्छा वोट मिला था, जिसके आधार पर वह 10 विधानसभा सीटें जीतने में कामयाब रही और भाजपा के साथ सत्ता में भागीदार बनी। इस चुनाव में भी जजपा यह कोशिश कर रही है कि हरियाणा की जाट और दलित बाहुल्य सीटों पर उसके उम्मीदवार अच्छा प्रदर्शन कर सकें। इस गठबंधन के बाद दुष्यंत चौटाला अपने चाचा एवं इनेलो विधायक अभय चौटाला के साथ फिर से आमने-सामने हो गए हैं। चंद्रशेखर व उनकी पार्टी का हरियाणा की दलित बाहुल्य सीटों पर असर रहा है। ऐसे में विधानसभा के चुनावी रण के दौरान एक जैसे समीकरणों के चलते चाचा-भतीजा फिर से आमने सामने होंगे।