निखिल
गुरुग्राम। गुरुवार को यहां लीला होटल में शुरू हुए तीन दिवसीय इको एशिया/इको इंडिया-2026 (एशियन पैसिफिक एसोसिएशन ऑफ इकोकार्डियोलॉजी एंड इंडियन एकेडमी ऑफ इकोकार्डियोलॉजी) अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत हुई। यह सम्मेलन शेपिंग द न्यू इरा ऑफ कार्डिएक इमेजिंग थीम पर आयोजित किया जा रहा है।
सम्मेलन के पहले दिन एग्जीक्यूटिव ऑर्गनाइजिंग प्रेसिडेंट आईएई डॉ. राकेश गुप्ता ने कहा हृदय रोग में लक्षणों का इंतजार करना सही तरीका नहीं है। कई लोगों में हृदय की संरचना में बदलाव बिना किसी परेशानी के विकसित होते हैं और मरीज लंबे समय तक अनजान रहता है। आधुनिक इमेजिंग शुरुआती स्तर पर इन बदलावों को पकडऩे में मदद करती है। सम्मेलन में स्टेज-बी हार्ट फेल्योर पर विशेष चर्चा हुई। इस स्टेज में मरीज को कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते, लेकिन दिल की बनावट और काम करने के तरीके में बदलाव शुरू हो चुके होते हैं। साइंटिफिक कमेटी आईएई चेयरमैन डॉ. हंसा गुप्ता ने कहा कि इकोकार्डियोग्राफी और स्ट्रेन इमेजिंग जैसी जांचें दिल की कार्यक्षमता में हो रहे शुरुआती बदलावों को पहचानने में मदद करती हैं। इस स्तर पर पहचान से जीवनशैली में बदलाव और समय पर इलाज शुरू कर बीमारी को बढऩे से रोका जा सकता है।
इंटरनेशनल चेयरमैन डॉ. जे. ओह ने कहा कि कई डायबिटिक मरीजों को सीने में दर्द नहीं होता, लेकिन दिल की मांसपेशियों में बदलाव शुरू हो चुके होते हैं। इसलिए डायबिटीज की देखभाल सिर्फ ब्लॉकेज की जांच तक सीमित नहीं होनी चाहिए। विशेषज्ञों ने कहा कि डायबिटीज का असर सिर्फ धमनियों में ब्लॉकेज तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक शुगर बढ़ा रहने से दिल की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं, जिसे डायबिटिक कार्डियोमायोपैथी कहते हैं।
इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के अनुसार 2024 में भारत में 8.98 करोड़ वयस्क डायबिटीज से पीडि़त थे। इस दौरान नेशनल चेयरमैन डा. एचके चोपड़ा ने कहा कि बड़ी चुनौती इस तकनीक को विशेषज्ञ केंद्रों से निकालकर आम आबादी तक पहुंचाने की है। आईएसीसी चेयरमैन डा. कपिल खन्ना ने कहा इकोकार्डियोग्राफी अब सिर्फ बीमारी पहचानने की जांच नहीं है। यह गैर-आक्रामक, बिना रेडिएशन वाली और दोहराई जा सकने वाली जांच है जो इलाज के साथ भविष्य के जोखिम को समझने में भी मदद करती है।