चंडीगढ़,06 अक्तूबर (न्यूज अपडेट इंडिया ) । हरियाणा सरकार द्वारा दादूपुर नलवी नहर को डीनोटीफाई किए जाने के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। हरियाणा सरकार जहां विभिन्न कथित किसान संगठनों के माध्यम से अपने फैसले को जायज ठहराने में जुटी हुई है वहीं विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। दादूपुर में धरना दिए जाने के बाद हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने आज यहां पत्रकारों से बातचीत के दौरान ऐलान कर दिया कि कांग्रेस की सरकार के सत्ता में आते ही फिर से दादूपुर नलवी नहर की खुदाई करवाई जाएगी।(SUBHEAD)
हुड्डा ने बीजेपी सरकार को नहर पाट सरकार करार देते हुए कहा कि पूरे देश में हरियाणा की बीजेपी पहली ऐसी सरकार है जो खुदी हुई नहर को पाट रही है। उन्होंने कहा कि नहर पर 300 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं और 70 फीसदी काम उनके कार्यकाल में पूरा हो गया था। यह नहर पर्मानेंट कैनाल नहीं बल्कि यमुना नदी के सरप्लस पानी और बारिश का पानी ऐसे इलाकों में पहुंचाने के लिए बनाई गई थी जहां जमीनी पानी का स्तर काफी नीचे है। 80 के दशक में नहर बनाने की योजना बनी थी और उनकी सरकार ने इस पर काफी काम किया और जब नहर में पानी गया तो कई जगह जमीनी पानी का स्तर 30-40 फुट ऊपर आया था। लेकिन, सरकार का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण तुगलकी फैसला है। सरकार गैरकानूनी फैसला कर रही है।
उन्होंने कहा कि किसी भी प्रोजेक्ट के लिए ली गई जमीन के लिए मुआवजा देना पड़ता है लेकिन, बीजेपी सरकार उलटा किसानों से पैसे मांग रही है। उन्होंने कहा कि इस नहर से 200 से ऊपर गांवों के लाखों लोगों को नहर का लाभ पहुंचना था। इस लिए सरकार को तुरंत अपना फैसला वापस लेना चाहिए।
उधर हरियाणा विधानसभा के विपक्षी दल इनेलो का एक प्रतिनिधिमंडल अभय चौटाला की अगुवाई में राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी से मिला। इनेलो ने एक ज्ञापन देते हुए दादुपुर-नलवी सिंचाई परियोजना को रद्द करने और सरकार का फैसला वापस लिए जाने की मांग उठाई। ज्ञापन में कहा गया कि दक्षिण हरियाणा जल संसाधन के मामले में पहले ही ‘डार्कजोन’ में घोषित किया जा चुका है और उत्तर हरियाणा, जिसमें यमुनानगर, अम्बाला और कुरुक्षेत्र जिले भी शामिल हैं वह इस विषय में ‘क्रिटिकल जोन’ घोषित किया जा चुका है। इसी कारण दादुपुर-नलवी सिंचाई परियोजना इन जिलों के लिए विशेष महत्व रखती है क्योंकि इससे न केवल 2.25 लाख एकड़ भूमि की सिंचाई संभव होनी थी बल्कि उससे उस समूचे क्षेत्र के भू-जल स्तर पर भी अनुकूल प्रभाव पडऩा था।
ज्ञापन में गया कि वर्ष 2005 में सरकार बदलने के बाद इस परियोजना को फिर भुला दिया था। ज्ञापन में कहा गया कि यह देखते हुए कि दक्षिण हरियाणा पहले ही डार्कजोन घोषित किया जा चुका है और उत्तर हरियाणा उस दिशा में बड़ी तेजी से बढ़ रहा है तो यदि सरकार द्वारा भू-जल स्तर में वृद्धि करने के सार्थक प्रयास न किए गए तो हरियाणा जिसकी अपनी विशिष्ठ पहचान उसकी उत्तम खेती और दूध और घी से बनती थी वह शीघ्र ही बंजर भूमि में बदल जाएगा। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार का यह नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य है कि वह ऐसे सार्थक कदम उठाए जिससे प्रदेश को इस संकट से बचाया जा सके।