चंडीगढ़। हरियाणा में एक बार फिर से हाथी ने चश्मा पहन लिया है। इनेलो व बसपा ने मिलकर विधानसभा चुनाव लडऩे का ऐलान किया है। हालांकि विधानसभा चुनाव में तीन माह का समय बाकि है और ऐसे में यह गठबंधन तीन माह तक स्थिर रह पाएगा या नहीं यह सवाल सभी के जहन में है। क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव से पहले भी गठबंधन तो हुआ था लेकिन चुनाव से पहले टूट गया था। एक मंच पर आने वाले दोनों दल हरियाणा की राजनीति में हाशिए पर हैं लेकिन अभय चौटाला को इनेलो को खड़ा रखने और विपक्ष पर दबाव बनाए रखने के लिए यह समझौता करना जरूरी था।
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इस गठबंधन के साथ ही प्रदेश में नई राजनीतिक चर्चाओं के साथ-साथ तीसरे मोर्चे के गठन को लेकर भी फिर से अटकलें शुरू हो गई हैं। प्रदेश में तीसरे मोर्चे के गठन की बात वर्ष 2006 से चल रही है जो आज तक सिरे नहीं चढ़ी है। तीसरे मोर्चे का सैद्धांतिक रूप से समर्थन करने वाले राजनीतिक दल लंबे समय से सत्ता से दूर हैं। जिसके चलते यह मामला आज तक सिरे नहीं चढ़ सका है।
इनेलो व बसपा गठबंधन के बाद प्रदेश में यह चर्चा फिर से शुरू हो गई है कि निकट भविष्य में होने वाले विधानसभा चुनाव दोनों राजनीतिक दल मिलकर लड़ सकते हैं। करीब छह साल पहले भी बसपास व इनेलो का चुनाव से पहले समझौता हुआ था लेकिन विधानसभा चुनाव आते-आते यह गठबंधन टूट गया था। इस बार अगर यह गठबंधन चुनाव लड़ता है तो सत्ता में भले ही न आए लेकिन कुछ सीटों पर कांग्रेस का खेल जरूर बिगाड़ सकता है।
मई 2018 में पार्टी ने इनेलो के साथ गठबंधन किया। मायावती ने अभय सिंह चौटाला को राखी बांधकर गठबंधन को और मजबूत किया, मगर लोकसभा चुनाव से पहले ही यह करार टूट गया। 2019 के चुनाव में बसपा ने राजकुमार सैनी की पार्टी लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी (लोसुपा) का साथ पकड़ा। चुनाव के बाद यह भी टूट गया। लोसुपा से साथ छूटने के बाद बसपा से गठबंधन किया और एक महीने बाद बसपा ने अलग राह पकड़ ली। 2019 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 4.2 प्रतिशत वोट हासिल किया।
इनेलो ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 1.89 प्रतिशत और विधानसभा चुनाव में 2.05 प्रतिशत ही वोट हासिल किए थे। इसके अलावा 2019 के चुनाव भाजपा की लहर ने हरियाणा में सभी दलों का सूपड़ा साफ कर दिया। 10 की 10 सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी विजयी हुए। हालही में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश में इनेलो को 1.74 प्रतिशत वोट ही मिले हैं।
अकाली दल के एजेंडे में नहीं है हरियाणा
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय प्रकाश सिंह बादल तथा चौटाला परिवार के निजी संबंधों के कारण हरियाणा में शुरू से ही अकाली दल व इनेलो का अघोषित गठबंधन रहा है। पार्टी लाइन से हटकर स्वर्गीय प्रकाश सिंह बादल तथा ओम प्रकाश चौटाला एक-दूसरे के लिए प्रचार करते रहे हैं। अकाली दल ने वर्ष 2009 के विधानसभा चुनाव में दो सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए और एक सीट पर जीत दर्ज की। 2014 में भी अकाली दल का एक विधायक विधानसभा में पहुंचा। 2019 में अकाली दल ने इनेलो के साथ मिलकर तीन सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन किसी भी सीट पर जीत नहीं मिली। अब पंजाब में अकाली दल पूरी तरह से हाशिए पर आकर बिखर चुका है। बादल परिवार की पूरी ताकत अकाली दल को बचाने में लगी हुई है। ऐसे में हरियाणा अकाली दल लीडरशिप के एजेंडे में नहीं है।