गुरुग्राम। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर यहां मैक्स अस्पताल में महिलाओं के सम्मान में एक समारोह आयोजित किया गया। इसमें अलग-अलग क्षेत्रों से महिलाओं ने शिरकत करके अपने विचार सांझा किया। साथ ही अस्पताल प्रबंधन की ओर से महिलाओं को बीमारियों के लक्षणों व उपचार के प्रति जागरुक किया गया। इस अवसर पर केक काटकर महिला दिवस की खुशी मनाई गई। एसएचई-शी (स्ट्रेंंथ, हेल्थ, एंपावरमेंट) नामक इस कार्यक्रम में महिलाओं ने अपनी देखभाल की यात्रा को सांझा किया। साथ ही आत्मदेखभाल के लिए शपथ दिलाई गई।
-आर्थिक रूप से संपन्नता का शॉर्टकट कुछ नहीं, सकारात्मकता से मेहनत जरूरी
कार्यक्रम से महिलाओं को अपने संदेश में नर्सिंग अधिकारी पूनम सहराय ने कहा कि बदलते समय के साथ महिलाओं ने समाज में अपने आप को साबित करके दिखाया है कि वे किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। उन्होंने रील संस्कृति पर कहा कि इस मंच पर जो कुछ नजर आ रहा है, वह ना तो कोई बड़ी उपलब्धि है और ना ही महिलाओं सम्मान इससे बढ़ रहा है। अगर हम इस मंच के माध्यम से अपनी प्रतिभा को निखारना चाहते हैं तो शालीनता हमारा गहना होना चाहिए। वल्गैरिटी हमारे लिए सम्मान नहीं ला सकती। इस पर भी हमें सोचना होगा। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर परोसा जा रहा कंटेंट महिलाओं के प्रति ऐसी सोच पैदा कर रहा है, जो किसी भी तरह से उनका सम्मान नहीं करती। पैसा कमाने के साधन बहुत हैं।
आत्मनिर्भर, आर्थिक रूप से मजबूत होना अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए आत्मसम्मान गिरवी नहीं रखा जा सकता। नर्सिंग अधिकारी पूनम सहराय ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस उन महिलाओं को समर्पित है, जिन्होंने अपनी मेहनत, संघर्ष से समाज में एक अलग पहचान बनाई है। उन्होंने बताया कि महिला दिवस की शुरुआत वर्ष 1909 में हुई थी। उस समय न्यूयॉर्क की सडक़ों पर करीब 15000 महिलाओं ने एकजुट होकर वोट देने के अधिकार, बेहतर वेतन और काम करने के घंटे कम करने की मांग को लेकर आंदोलन किया था। बाद में वर्ष 1975 में संयुक्त राष्ट्र ने इसे अधिकारिक मान्यता दी। तभी से इसे हर साल एक खास थीम के साथ मनाया जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि कन्या भ्रूण हत्या के प्रति भी समाज को जागरुक होना चाहिए। बेटी ने जन्म लिया है और जो उसे पसंद नहीं कर रहे तो बेटी का दान कर दें। किसी की सूनी गोद को भर दें। वे हत्या जैसे पाप से भी बच जाएंगें और बेटी को परिवार, मां-बाप मिल जाएंगें। यह सोच और जागरुकता होनी भी समाज में जरूरी है। महिला दिवस की सार्थकता भी तभी है, जब हमारे विचार समाज में मान्य हों और उन पर अमल हो। पूनम सहराय ने कहा कि जो लोग महिलाओं को पीछे धकेलने की सोच रखते हैं, उनसे इतनी गुजारिश है कि वे अपने घर की बेटियों, महिलाओं को अवसर दें। वह पूरी दुनिया बदल सकती हैं।
इस अवसर पर समाजसेविका मंजू देसवाल, लायंस क्लब की सदस्य वीना अहलावत, सेवानिवृत सीनियर नर्सिंग अधिकारी कमलेश गहलोत ने भी अपने विचार सांझा किए। उन्होंने कहा कि यह एक तारीख नहीं, बल्कि नारी शक्ति के संघर्ष, संकल्प और सफलता का उत्सव है। यह दिन नारी सशक्तिकरण, समानता और अधिकारियों की लंबी लड़ाई का परिणाम है। उन्होंने कहा कि क्यों कहती है दुनिया नारी कमजोर है, आज भी नारी के हाथों में घर चलाने की डोर है।