रोहतक। जिला के गांव जेठपुर (तैमूरपुर) के सबसे बुजुर्ग दीपचंद भट्ठी का मंगलवार को ब्रह्म मुहुर्त में सुबह 03:15 बजे निधन हो गया। वे 94 साल के थे और इस उम्र तक वे पूर्ण रूप से स्वस्थ थे। सुबह-शाम सैर करना उनकी दिनचर्या में शामिल था। ऊंची कद-काठी के व्यक्तित्व वाले दीपचंद भट्ठी के निधन की सूचना पर आसपास के गांवों से भी मौजिज और समाजसेवी लोग पहुंचे और उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए।
-स्वर्गीय दीपचंद भट्टी अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं
-उनके अंतिम संस्कार में अनेक गांवों से मौजिज लोग पहुंचे
स्वर्गीय दीपचंद भट्ठी अपने पीछे पौते-पड़पौते और नाती-नातिन का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके छह बेटे सतबीर सिंह, राजेंद्र सिंह, महेंद्र सिंह, बहादर सिंह, राजेश कुमार, राकेश कुमार के अलावा तीन बेटियां माया, शीला, निर्मला हैं। 10 पौते, 2 पड़पौते, 2 पड़पौती नाती-नातिन, पडऩातिन हैं। सतबीर सिंह भिवानी के केएम पब्लिक स्कूल में नौकरी करते हैं। महेंद्र सिंह भी एक निजी संस्थान में कार्यरत हैं। बहादर सिंह गांव में ही रहकर निजी व्यवसाय करते हैं। राजेश कुमार गुरुग्राम में नौकरी करते हैं। सबसे छोटे पुत्र राकेश भट्ठी पत्रकार हैं।
हमेशा ही हंसमुख रहने वाले श्री दीपचंद भट्ठी जेठपुर गांव में नौ दशक की उम्र पार के पहले पूर्णतया स्वस्थ व्यक्ति थे। मिलनसार व्यक्तित्व के धनी दीपचंद भट्ठी गांव के लिए उस बरगद की तरह से थे, जो सबको छांव देता है। हर किसी को उनका आशीर्वाद और सुखी रहने का आशीर्वाद मिलता था। गांव की गलियों में खेलते बच्चों का प्यार से सिर पुचकारना और बड़ों से आत्मीयता से मिलकर बातें करना उनकी आदत में शामिल था। दूर से ही लोगों को देखकर खुद ही आगे से राम-राम करना भी वे नहीं भूलते थे। बच्चों के साथ बच्चे और बड़ों के साथ बड़े बनकर वे रहते थे। उनका सांसारिक जीवन से जाना सिर्फ एक परिवार को ही नहीं, पूरे गांव के लिए क्षति है। गांव के हर घर, हर व्यक्ति से वे मिलते रहते थे।
बुजुर्ग दीपचंद भट्ठी एवं उनकी पत्नी संतरा देवी ने हमेशा परिवार को एक सूत्र में बांधकर रखा है। गांव से लेकर शहर तक परिवार फैला है, लेकिन उनके एक बोल पर परिवार हमेशा उनके सामने एक साथ खड़ा नजर आया। परिवार को एकजुट रखने की जिम्मेदारी पत्नी संतरा देवी को देकर वे जब दुनिया से विदा हुए तब भी परिवार के सदस्यों से मिलते रहे। जो बाहर थे उनसे मोबाइल पर बातें की। इसके बाद 03:15 बजे ब्रह्म मुहुर्त में यह कहकर सदा के लिए गहरी निद्रा में सो गए कि अब जाने का टाइम हो गया। श्री दीपंचद भट्ठी चार पीढिय़ों का नेतृत्व करके गए हैं। उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने पहुंचे लोग उनके जीवन के संस्मरण याद करते हुए उनके जाने को अपूरणीय क्षति बता रहे थे।