कुरुक्षेत्र। धनतेरस का पर्व सुख-समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना गया है। धनतेरस पर मां लक्ष्मी, धन देवता कुबेर और आरोग्य देवता भगवान धनवंतरि की पूजा से घर में मां लक्ष्मी की कृपा बढ़ती है और व्यापार व नौकरी में लाभ मिलता है तथा जीवन मेंसुख-शांति बनी रहती है। धनतेरस पर सन्निहित सरोवर स्थित विष्णु कूप प्राचीन श्री लक्ष्मी-नारायण मंदिर में पीतल का ताला-चाबी चढ़ाने की परंपरा है। मान्यता है कि पीतल का ताला-चाबी चढ़ाने से सुख-समृद्धि बढ़ती है और आर्थिक खुशहाली भी आती है। इसी मान्यता के तहत शनिवार को धनतेरस पर विशेष रूप से पीतल का ताला-चाबी श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाया जाएगा।
धनतेरस पर विष्णुकूप श्री लक्ष्मी-नारायण मंदिर में आज चढ़ेंगे पीतल के ताला-चाबी
लक्ष्मी-नारायण मंदिर में ताला-चाबी चढ़ाने से आती है सुख-समृद्धि और खुशहाली
मंदिर व्यवस्थापक स्वामी हरि नारायण गिरी महाराज का कहना है कि चोल राजवंश के शासन के दौरान धर्मनगरी में बनाए गए लक्ष्मी नारायण मंदिर में धनतेरस के दिन पीतल के ताला-चाबी चढ़ाने की परंपरा है। मान्यता है कि कुबेर को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धालु ऐसा करते हैं। मंदिर पहुंचकर श्रद्धालु मन्नत मांगते है कि हमारी किस्मत के ताले खोलो और हम पर धन की वर्षा करो। मंदिर में पीली चीजें चढ़ाने का विशेष महत्व है। इसलिए मंदिर में श्रद्धालु पीला रंग होने के कारण पीतल के ताला-चाबी चढ़ाने आते हैं।
स्वामी हरि नारायण गिरी महाराज का कहना है कि भगवान विष्णु का यह प्राचीन मंदिर हैं। गुरुवार को श्रद्धालु भगवान श्री लक्ष्मी-नारायण जी को प्रसन्न करने के लिए पीली वस्तु चने की दाल बेसन के लड्डू, केला, हल्दी, बृहस्पति दोष निवारण एवं घर में सुख शांति के लिए भगवान के चरणों में अर्पण करते हैं इस मंदिर परिषद में एक प्राचीन कुआं भी स्थित है जो महाभारत युद्ध के पश्चात धर्मराज रजिस्टर ने कर कुएं खुद आए थे उसमें से एक विष्णु कूप जो कि इस मंदिर परिसर में मौजूद है श्रद्धालु अलग-अलग राज्य से यहां पर दर्शन पूजा करने आते हैं एवं अपने घर परिवार में सुख शांति के लिए मनोकामना मांगते हैं। मंदिर धर्म नगरी कुरुक्षेत्र सन्नहित सरोवर के सामने स्थित है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर भगवान शिव की एक आकर्षक मूर्ति रखी गई है। मंदिर में भगवान गणेश, भगवान गरुड़ और भगवान कुबेर की मूर्तियों की भी पूजा होती है। मंदिर वास्तु शास्त्र की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसका पूर्व मुख सूर्य की पहली किरण को भगवान के चरणों का स्पर्श कराता है।