उसका संघर्ष उसे भीतर से तोड़ता है, और अंतत: वह उस स्थिति में पहुंच जाता है जहां उसे पागल करार दिया जाता है। यह नाटक दर्शकों से सवाल करता है कि क्या हम भी गलत देखकर चुप रहते हैं। क्या हम फ्रेम के भीतर सुरक्षित रहना चाहते हैं,या सच के साथ बाहर खड़े होने की हिम्मत रखते हैं। इस आयोजन को सफल बनाने में नेहा, जितेंद्र, वसीम, सौरव, प्राची, अनुज आदि की भूमिका अहम रही।