दिल्ली:- सीनियर फिजिशियन एवं डायबिटीज स्पेशलिस्ट डॉ. अनेजा का कहना है कि मोटापे और मानसिक स्वास्थ्य के बीच एक जटिल और आपसी संबंध होता है। मेटाबोलिक गड़बड़ी (शरीर में मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्या) के कारण डिप्रेशन और एंग्जायटी (चिंता) का खतरा बढ़ जाता है। खाने में ज़्यादा सैचुरेटेड फैट और चीनी वाली डाइट से मेटाबोलिक गड़बड़ी, न्यूरोइन्फ्लेमेशन (दिमाग में सूजन) और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। हमारे शरीर की चर्बी (एडिपोज़ टिश्यू) और आंतों से होने वाली सूजन और दिमाग में पोषक तत्वों के स्तर में बदलाव से न्यूरोइन्फ्लेमेशन होता है और इससे मूड, मोटिवेशन और भावनाओं को कंट्रोल करने वाले कॉर्टिको-लिम्बिक नेटवर्क की बनावट, उत्तेजना और कनेक्टिविटी में बदलाव आता है। डॉ. अनेजा ने बताया कि मोटापे से ग्रस्त लोगों में डिप्रेशन और एंग्जायटी का खतरा ज़्यादा होता है, जबकि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं वाले लोगों में वज़न बढ़ने की संभावना भी ज़्यादा होती है।
इस संबंध के पीछे बायोलॉजिकल और सामाजिक दोनों तरह के कारण होते हैं। मोटापे से ग्रस्त लोगों में डिप्रेशन होने की संभावना 18% से 55% तक ज़्यादा होती है। वज़न को लेकर भेदभाव (वेट स्टिग्मा), भेदभावपूर्ण व्यवहार और अपनी बॉडी इमेज को लेकर नकारात्मक सोच इस समस्या को और बढ़ा देते हैं, जिससे आत्मविश्वास कम हो सकता है और गंभीर मानसिक परेशानी हो सकती है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं (जैसे डिप्रेशन) के कारण वज़न बढ़ने का खतरा 37% से 58% तक बढ़ जाता है। इसके अलावा, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए दी जाने वाली कई दवाओं के साइड इफ़ेक्ट के तौर पर वज़न बढ़ना आम बात है। सैचुरेटेड फैट और चीनी वाली डाइट और शरीर में ज़्यादा चर्बी (एडिपोज़ टिश्यू) से होने वाली सूजन मिलकर न्यूरोइन्फ्लेमेशन को बढ़ावा दे सकती हैं, जिससे मूड, मोटिवेशन और भावनाओं को कंट्रोल करने वाले ब्रेन नेटवर्क में बदलाव आता है।
हाइपोथैलेमिक-पिट्यूटरी-एड्रेनल (HPA) एक्सिस—जो तनाव और कोर्टिसोल के उत्पादन को कंट्रोल करता है—में गड़बड़ी के कारण ज़्यादा वज़न और खराब मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध बनता है। मानसिक स्वास्थ्य का मोटापे पर असर: मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं (जैसे डिप्रेशन) के कारण वज़न बढ़ने का खतरा 37% से 58% तक बढ़ जाता है। इसके मैनेजमेंट और इलाज के लिए अक्सर कई तरह के विशेषज्ञों की ज़रूरत होती है जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों का ध्यान रखें। सफल मैनेजमेंट में आमतौर पर साइकोथेरेपी, जैसे कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) शामिल होती है, जो इमोशनल ईटिंग (भावनाओं के कारण ज़्यादा खाना) को कंट्रोल करने, बॉडी इमेज को बेहतर बनाने और वज़न को लेकर भेदभाव से होने वाले तनाव को कम करने में मदद कर सकती है।
नियमित और मध्यम-तीव्रता वाली एक्सरसाइज़ (हफ़्ते में कम से कम 150 मिनट) सहित शारीरिक गतिविधि से कार्डियोवैस्कुलर स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है, डिप्रेशन के लक्षण कम हो सकते हैं और वज़न को बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इंटीग्रेटेड केयर (समग्र देखभाल) में मेटाबोलिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों कारकों को ध्यान में रखा जाता है, जिससे मरीज़ की व्यापक और मरीज़-केंद्रित देखभाल सुनिश्चित होती है।