नई दिल्ली,5 नवंबर ( न्यूज़ अपडेट इंडिया ) । भूमि अधिग्रहण के मामले में बीस साल बाद नये सिरे याचिका दाखिल कर मुआवजा बढ़ाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। हालांकि कोर्ट ने ये साफ कर दिया है कि अगर भूस्वामी किसानों की मुआवजा बढ़ाने की मांग सुनी जाती तो उन्हें इतने दिनों की देरी का कोई कानूनी लाभ यानी ब्याज आदि नहीं मिलेगा। ये आदेश न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति आर भानुमती की पीठ ने ग्रेटर नोएडा के करीब 150 किसानों की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
ये मामला ग्रेटर नोएडा में दादरी नोएडा रोड से लगे गांव गुलसितापुर, करनवास और हबीबपुर के भूमि अधिग्रहण का है। प्रदेश सरकार ने 1985 में अधिसूचना जारी कर यहां की जमीन अधिग्रहित की थी। रिफरेंस कोर्ट ने 30 रुपये प्रति वर्गगज की दर से जमीन का मुआवजा दिया था, लेकिन सरकार और किसानों की ओर से दाखिल अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 1996 में रिफरेंस कोर्ट द्वारा तय 30 रुपये प्रति वगर्गज का मुआवजा घटा कर 20 रुपये प्रति वर्गगज कर दिया।
इसके बाद किसान मन मसोसकर चुप बैठ गये थे, लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनके गांव के साथ के गांव कासना के अधिग्रहण (कासना गांव में जमीन अधिग्रहण 1989 में हुआ) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2016 में मुआवजा 7 रुपये प्रति वर्गगज से बढ़ाकर 65 रुपये प्रति वर्गगज कर दिया है तो इन किसानों ने भी बराबरी के हक का दावा करते हुए सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर मुआवजा बढ़ाने की मांग की है।
बहस के दौरान पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए किसानों के वकील ऋषि मल्होत्रा ने कहा कि कोर्ट लगातार कहता रहा है कि भूमि अधिग्रहण मुआवजे के मामलों में भूस्वामियों की बराबरी की मांग पर विचार करते समय व्यवहारिक नजरिया अपनाया जाना चाहिये।
20 साल की देरी पर ऋषि मल्होत्रा कहना था कि वे इसके बदले हाईकोर्ट का फैसला आने की तिथि से लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने तक की अवधि का ब्याज छोड़ने को तैयार हैं। पीठ ने दलीलें सुनने के बाद किसानों की रिट याचिका और देरी से रिट दाखिल करने की माफी अर्जी, दोनों पर प्रदेश सरकार व अन्य को नोटिस जारी किया। साथ ही साफ किया कि अगर कोर्ट देरी माफ करके मामले पर सुनवाई करता है तो भी याचिकाकर्ता इस देरी की अवधि के किसी भी विधायी अधिकार के हकदार नहीं होंगे।