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तीन नए आपराधिक कानून आज से लागू, जानें- न्याय व्यवस्था और नागरिकों पर होगा क्या असर

Updated on Monday, July 01, 2024 15:41 PM IST

नई दिल्ली। पहली जुलाई यानी आज से काफी कुछ बदलने जा रहा है। खासकर क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में। आज से 1860 में बनी आईपीसी की जगह भारतीय न्याय संहिता, 1898 में बनी सीआरपीसी की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और 1872 के इंडियन एविडेंस एक्ट की जगह भारतीय साक्ष्य अधिनियम ले लेगी। इन तीनों नए कानूनों के लागू होने के बाद कई सारे नियम-कायदे बदल जाएंगे। इनमें कई नई दफा यानी धाराएं शामिल की गई हैं तो कुछ धाराओ में बदलाव हुआ है, कुछ हटाई गई हैं। नए कानून लागू होने पर आम आदमी, पुलिस, वकील और अदालतों के कामकाज में काफी बदलाव होगा।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में शामिल अहम बदलाव

CRPC में जहां कुल 484 धाराएं थीं वहीं भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में 531 धाराएं हैं। इसमें ऑडियो-विडियो यानी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से जुटाए जाने वाले सबूतों को प्रमुखता दी गई है। वहीं, नए कानून में किसी भी अपराध के लिए जेल में अधिकतम सजा काट चुके कैदियों को प्राइवेट बॉण्ड पर रिहा करने का प्रावधान है। कोई भी नागरिक अपराध के सिलसिले में कहीं भी जीरो FIR दर्ज करा सकेगा। FIR होने के 15 दिनों के भीतर उसे ओरिजिनल जूरिडिक्शन यानी जहां का मामला है वहां भेजना होगा। पुलिस ऑफिसर या सरकारी अधिकारी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए 120 दिन में संबंधित अथॉरिटी से इजाजत मिलेगी। अगर नहीं मिली तो उसे ही सेंक्शन मान लिया जाएगा।

FIR के 90 दिनों के भीतर दाखिल करनी होगी चार्जशीट

FIR के 90 दिनों के भीतर दाखिल करनी होगी चार्जशीट दाखिल करनी होगी। चार्जशीट दाखिल होने के 60 दिनों के भीतर कोर्ट को आरोप तय करने होंगे। इसके साथ ही मामले की सुनवाई पूरी होने के 30 दिनों के भीतर जजमेंट देना होगा। जजमेंट दिए जाने के बाद 7 दिनों के भीतर उसकी कॉपी मुहैया करानी होगी। पुलिस को हिरासत में लिए गए शख्स के बारे में उसके परिवार को लिखित में बताना होगा। ऑफलाइन, ऑनलाइन भी सूचना देनी होगी। 7 साल या उससे ज्यादा सजा वाले मामले में विक्टिम को सुने बिना वापस नहीं किया जाएगा।थाने में कोई महिला सिपाही भी है तो उसके सामने पीड़िता के बयान दर्ज कर पुलिस को कानूनी कार्रवाई शुरू करनी होगी।

किन मामलों में नहीं कर सकेंगे अपील?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 417 में बताया गया है कि किन मामलों में सजा मिलने पर ऊपरी अदालत में उसके खिलाफ अपील नहीं की जा सकती। अगर हाईकोर्ट से किसी दोषी को 3 महीने या उससे कम की जेल या 3 हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों की सजा मिलती है, तो इसे ऊपरी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। आईपीसी में धारा 376 थी, जिसके तहत 6 महीने से कम की सजा को चुनौती नहीं दे सकते थे। यानी, नए कानून में थोड़ी राहत दी गई है।

इसके अलावा, अगर सेशन कोर्ट से किसी दोषी को तीन महीने या उससे कम की जेल या 200 रुपये का जुर्माना या दोनों की सजा मिलती है, तो इसे भी चुनौती नहीं दे सकते। वहीं, अगर मजिस्ट्रेट कोर्ट से किसी अपराध में 100 रुपये का जुर्माने की सजा सुनाई जाती है तो उसके खिलाफ भी अपील नहीं की जा सकती। हालांकि, अगर किसी और सजा के साथ-साथ भी यही सजा मिलती है तो फिर इसे चुनौती दी जा सकती है।

कैदियों के लिए क्या कुछ बदला?

जेल में बढ़ती कैदियों की संख्या के बोझ को कम करने के मकसद से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में एक बड़ा बदलाव किया गया है। कानून की धारा 479 में प्रावधान किया गया है कि अगर कोई अंडर ट्रायल कैदी अपनी एक तिहाई से ज्यादा सजा जेल में काट चुका है तो उसे जमानत पर रिहा किया जा सकता है। हालांकि, ये राहत सिर्फ पहली बार अपराध करने वाले कैदियों को ही मिलेगी। ऐसे कैदियों को जमानत नहीं दी जाएगी, जिन्होंने उम्रकैद की सजा वाले अपराध किए हों। इसके अलावा सजा माफी को लेकर भी बदलाव किया गया है।

अगर किसी कैदी को सजा-ए-मौत मिली हो तो उसे उम्रकैद में बदला जा सकता है। इसी तरह उम्रकैद की सजा पाए दोषी को 7 साल की जेल में तब्दील किया जा सकता है। साथ ही जिन दोषियों को 7 साल या उससे ज्यादा की जेल की सजा मिली होगी, उनकी सजा को 3 साल की जेल में बदला जा सकता है। जबकि, 7 साल या उससे कम की सजा वाले दोषियों को जुर्माने की सजा सुनाई जा सकती है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम में क्या हुए जरूरी बदलाव

भारतीय साक्ष्य अधिनियम में कुल 170 धाराएं हैं। अब तक इंडियन एविडेंस ऐक्ट में कुल 167 धाराएं थीं। नए कानून में 6 धाराओं को निरस्त किया गया है। इसमें 2 नई धाराएं और 6 उप-धाराओं को जोड़ा गया है। गवाहों की सुरक्षा के लिए भी प्रावधान है। तमाम इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी कागजी रिकॉर्ड की तरह ही कोर्ट में मान्य होंगे। इसमें ईमेल, सर्वर लॉग, स्मार्टफोन और वॉइस मेल जैसे रिकॉर्ड भी शामिल हैं।

महिलाओं व बच्चों से जुड़े अपराध

महिलाओं व बच्चों से जुड़े अपराधों में धारा 63-99 तक रखा गया है। अब दुष्कर्म को धारा 63 से परिभाषित किया गया है। रेप की सजा को धारा 64 में बताया गया है। इसके साथ ही गैंगरेप के लिए धारा 70 है । सेक्सुअल हरासमेंट का अपराध धारा 74 में परिभाषित किया गया है। नाबालिग से रेप के मामले या गैंगरेप के मामले में अधिकतम फांसी की सजा का प्रावधान किया गया है। धारा 77 में स्टॉकिंग को परिभाषित किया गया है, वहीं दहेज हत्या धारा-79 में और दहेज- प्रताड़ना धारा-84 में बताया गया है। शादी का झांसा या वादा कर संबंध बनाने वाले अपराध को रेप से अलग अपराध बनाया गया है यानी उसे रेप की परिभाषा में नहीं रखा गया है।

 

 

 

 

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