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राष्ट्रीय

विवाह अवैध होने की स्थिति में भी सुरक्षा अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता

Updated on Monday, December 21, 2020 21:55 PM IST

विवाह अवैध होने की स्थिति में भी सुरक्षा अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मुस्लिम दंपती की सुरक्षा की मांग पर दिए सुरक्षा के आदेश
चंडीगढ़, 21 दिसंबर।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम दंपती की याचिका पर सुनवाई करते हुए साफ कर दिया है विवाह अवैध होने की स्थिति में भी किसी दंपती को उसके कानूनी सुरक्षा अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट की जस्टिस अलका सरीन ने इसी के पुलिस अधीक्षक, नूंह, हरियाणा को निर्देश दिया गया कि वह मुस्लिम दंपती की सुरक्षा की मांग पर उचित निर्णय ले।
मेवात निवासी जाकर व उसकी प्रेमिका जो मुस्लिम थी ने घरवालों की मर्जी के खिलाफ निकाह कर लिया था। जाकर की पहली पत्नी व उसकी प्रेमिका के घरवालों से जान का खतरा बताकर दोनों ने हाई कोर्ट में सुरक्षा की गुहार लगाई थी। कोर्ट को बताया गया था कि युवक 23 साल व युवती 18 साल की है और वो कानूनन व मुस्लिम धर्म के अनुसार विवाह करने का अधिकार रखते हैंं, लेकिन उनके रिश्तेदार उनके विवाह से खुश नहीं है और जान से मारने की धमकी दे रहे हैंं। इस मामले में रोचक बात यह है कि युवक की पहली पत्नी ने हाई कोर्ट में अपने वकील के माध्यम से पेश होकर विवाह पर ऐतराज जताते हुए कहा कि मुस्लिम धर्म के अनुसार दूसरी शादी के लिए पहली पत्नी की रजामंदी जरूरी है, लेकिन उससे इस बाबत सहमति नहीं ली गई, ऐसे में यह विवाह अवैध है। कोर्ट ने कहा कि वह इस बात पर कोई फैसला नहीं दे रहा कि पहली पत्नी की सहमति के बिना याचिकाकर्ताओं की शादी अवैध है। कोर्ट अपनी आंखे बंद नहीं कर सकता है कि याचिकाकर्ताओं को जान के खतरा की आंशका है। विवाह अवैध है, इसे आधार बनाकर किसी को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं कर सकते।
कोर्ट ने कहा यहां मुद्दा विवाह की वैधता का नहीं है, लेकिन तथ्य यह है कि याचिकाकर्ता भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। 
इसी के साथ हाई कोर्ट ने सुरक्षा के बारे में आदेश जारी करते हुए साफ कर दिया कि हाई कोर्ट के आदेश इस विवाह की वैधता और दर्ज आपराधिक मामलों को प्रभावित नहीं करता और पुलिस नियमों अनुसार कार्रवाई करने में सक्षम है।
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