संजय कुमार मेहरा
गुरुग्राम। आगे से बरसते पत्थर और पीधे धंसती सड़क। मलबा, मौत और मातम का जो भयानक सच था, वो आज भी उस तारीख के निकट आते ही सामने आ जाता है। तस्वीरों और वीडियो फिल्म की तरह जहन में वह मंजर घूमने लगता है। वर्ष 2013 में केदारनाथ में हुई जल प्रलय के प्रत्यक्षदर्शी सिक्स सिग्मा हाई ऐल्टिटूड के सीईओ डा. प्रदीप भारद्वाज भी इस आपदा में लाशों के ढेरों के बीच जिंदगी बचाते रहे। इस आपदा में मेडिकल सेवाएं लेकर सबसे पहले उनकी टीम पहुंची थी। हमारे साथ उन्होंने अपने उस समय के अनुभव सांझा किए।
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डा. प्रदीप भारद्वाज कहते हैं कि शिव की धरती केदारनाथ में 2013 के जून माह में आई आपदा से संहार और तबाही का जो तांडव मचा, उसने सिर्फ उत्तराखंड को ही तहस-नहस नहीं किया, बल्कि पूरे देश को रूला दिया था। दुनिया को प्रकृति की ताकत के समक्ष अपनी क्षमता को देखने का एक और दर्पण दे दिया। उत्तराखंड में आफत रात को दबे पांव आई और किसी को संभलने तक का मौका नहीं दिया। उस घटना को याद करते ही हमारी आंखें भर आती हैं। सिक्स सिग्मा हेल्थकेयर की टीम ने जान पर खेलकर केदारनाथ, गौरीकुंड व बद्रीनाथ में फंसे 511 लोगों के ना केवल जीवन की रक्षा की, बल्कि पुनर्वास में भी उनकी मदद की थी।
सबसे पहली मेडिकल सेवाएं लेकर पहुंची थी टीम
डा. भारद्वाज बताते हैं कि 16-17 जून 2013 को जब उन्हें केदारनाथ त्रासदी की सूचना मिली तो टीम वहां पहुंचने वाली सबसे पहली मेडिकल टीम थी। उस समय गौचर स्थित एयरफोर्स स्टेशन पर ब्रिगेडियर केबी चांद ने कहा कि डा. भारद्वाज हम आपको केदारनाथ छोड़ तो देंगे, लेकिन वापस लाने की कोई गारंटी नहीं है। उन्होंने कहा कि ब्रिगेडियर साहब कोई बात नहीं, हमें भी वापसी आने का कोई गम नहीं होगा, अगर हम वहां पहुंच गए तो। बस आप हमें वहां पर एक बार छोड़ तो दीजिए, बाकी हम सब कुछ संभाल लेंगें। यह कहने की हिम्मत शायद हर किसी में नहीं हो सकती। क्योंकि ब्रिगेडियर केबी चांद का सीधा इशारा जिंदगी और मौत दोनों से कुछ भी होने की तरफ था।
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चारों तरफ बिखरी पड़ी थी लाशें
यादों के झरोखे में झांककर डा. प्रदीप भारद्वाज बताते हैं कि हम जब वहां पहुंचे तो चारों ओर लाशें बिखरी पड़ी थी। सड़कें धंसती जा रही थी। सामने बड़े-बडे पत्थर के टुकड़े बरस रहे थे। लोग हमारे सामने मौत के मुंह में समा रहे थे। हमने बिना समय गंवाए खुद को उनकी जिंदगी बचाने के लिए झोंक दिया। हमारी टीम के हौंसले को देखते हुए ब्रिगेडियर केबी चांद ने हमें सेना की मदद उपलब्ध कराई। उन्होंने हेलीकॉप्टर की सेवा दी, जिससे हमें घायलों को फौरन चिकित्सीय राहत उपलब्ध कराने में मदद मिली। सेना के हेलीकॉप्टर की मदद से गौरी कुंड व केदारनाथ में मेडिकल रेस्क्यू किया। जहां मेडिकल कैंप लगाया था, वहां लाशों का ढेर लगा हुआ था। बदबू के कारण सांस लेना भी मुश्किल था। इसके बावजूद भी रात-दिन नि:स्वार्थ भाव से लोगों को चिकित्सा सेवा प्रदान की।
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कई बार टीम का भी मौत से सामना हुआ
डा. भारद्वाज कहते हैं कि कई बार हमारा सामना भी मौत से हुआ, लेकिन हमने अपना हौंसला नहीं छोड़ा। प्राकृतिक त्रासदी और मानवीय संघर्ष की उस दिल दहला देने वाली घटना का सजीव वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक खंड-खंड हो गया उत्तराखंड में किया है। वर्ष 2014 में इस पुस्तक का लोकार्पण दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव संजय कुमार श्रीवास्तव ने किया। स्वर्ग के द्वार खोलते केदारनाथ में उत्तराखंड सरकार के सहयोग से हाई ऐल्टिटूड हॉस्पिटल की स्थापना की। उत्तराखंड के गौरवशाली परंपरा के प्रति समर्पण भाव के साथ सिक्स सिग्मा ने उत्तम स्वास्थ्य सेवा, सत्य, साहस, समर्पण और पराक्रम से प्रदेश के विकास में चार चांद लगाए और कन्धे से कन्धा मिलाकर अदम्य साहस का परिचय दिया।
इन यात्राओं पर मेडिकल सेवा देती है संस्था
सिक्स सिग्मा के नेतृत्व में कैलाश मानसरोवर (नाथुला-सिक्किम), श्री अमरनाथ (जम्मू-कश्मीर), श्री केदारनाथ, श्री मद्महेश्वर, हेमकुंड साहिब (उत्तराखंड) और श्री मणिमहेश (हिमाचल प्रदेश) की यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं को फ्री चिकित्सा सुविधा देती है। उच्च उक्तांश क्षेत्रों में सिक्स सिग्मा हाई ऑल्टीट्यूड मेडिकल सर्विस के 450 डॉक्टर्स और वॉलंटियर्स ने 153000 से अधिक यात्रियों को चिकित्सा सुविधा प्रदान कराई।
केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री को भी बचाया था
डा. भारद्वाज के मुताबिक वर्तमान में केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे भी उस भीषण बाढ़ में परिवार के साथ फंस गए थे। उन्हें भी सिक्स सिग्मा की टीम ने बचाया था। मंदिर के गर्भगृह में शरण दी गई। तीन दिन तक वहीं रहे। इस आपदा में उनके दो रिश्तेदारों की मृत्यु हो गई। उनके सुरक्षाकर्मी, पंडित और निजी सहायक तो लापता ही हो गए थे। मंत्री चौबे ने भी पुस्तक त्रिनेत्र लिखी है, जिसमें उन्होंने सिक्स सिग्मा के साहस का भी जिक्र किया है।