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चंडीगढ़

न्याय प्रणाली में प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग एक सहायक उपकरण के रूप में होना चाहिए - न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह

Updated on Saturday, March 28, 2026 17:34 PM IST

चण्डीगढ़, 28 मार्च - भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह ने कहा कि न्यायिक प्रणाली में प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग न्याय प्रक्रिया को सुगम और प्रभावी बनाने के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन अंतिम निर्णय लेने की जिम्मेदारी सदैव न्यायाधीशों की होनी चाहिए। न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह ने यह बात आज राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय तथा चंडीगढ़ न्यायिक अकादमी के सहयोग से ‘‘प्रौद्योगिकी के माध्यम से कानून की भूमिका को आगे बढ़ाना ‘चुनौतियाँ और अवसर‘ विषय पर  आयोजित क्षेत्रीय सम्मेलन के दौरान सम्बोधित करते हुए कही।

 

न्यायमूर्ति मसीह ने प्रौद्योगिकी के माध्यम से कानून की भूमिका को आगे बढ़ाना ‘चुनौतियाँ और अवसर‘ विषय पर आयोजित क्षेत्रीय सम्मेलन का किया उदघाटन

उन्होंने कहा कि न्याय केवल मामलों का तकनीकी या यांत्रिक तरीके से निपटारा करने का विषय नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय दृष्टिकोण और संवेदनशीलता का भी महत्वपूर्ण स्थान है। तकनीक, एल्गोरिदम और एआई न्यायिक प्रणाली को जानकारी उपलब्ध कराने और प्रक्रियाओं को तेज करने में सहायक हो सकते हैं, लेकिन इन्हें न्याय देने वाले के रूप में नहीं देखा जा सकता। वर्तमान परिस्थितियों में न्यायिक निर्णय का अधिकार और जिम्मेदारी न्यायाधीशों के पास ही रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों में अपार संभावनाएं हैं और वे न्यायिक प्रणाली में पारदर्शिता तथा दक्षता बढ़ाने में मदद कर सकती हैं। हालांकि यह भी आवश्यक है कि इन तकनीकों का लाभ आम नागरिकों और वादियों तक प्रभावी ढंग से पहुँचे तथा उन्हें इनके उपयोग के बारे में पर्याप्त जानकारी और प्रशिक्षण दिया जाए।

न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह ने कहा कि तकनीक का उद्देश्य न्याय को प्रतिस्थापित करना नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना होना चाहिए न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह ने न्यायपालिका, कार्यपालिका और अन्य संस्थाओं के बीच सहयोग पर बल देते हुए कहा कि न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए केवल समस्याओं को सामने लाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठोस और व्यावहारिक समाधान भी प्रस्तुत करने होंगे। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति शील नागू ने न्यायिक क्षेत्र में प्रौद्योगिकी की बढ़ती भूमिका पर बल देते हुए कहा कि तकनीक न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और सुलभ बनाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है, किन्तु इसके उपयोग में न्याय के मूलभूत सिद्धांतों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कानून का शासन केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक के लिए न्याय, निष्पक्षता और समानता का भरोसा है। उन्होंने कहा कि अदालतों के हर आदेश और प्रत्येक कार्यवाही का उद्देश्य इसी भरोसे को मजबूत करना होता है। वर्तमान समय में प्रौद्योगिकी ने जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है और न्याय प्रणाली भी इससे अछूती नहीं है। अदालतों में प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण, रिकॉर्ड का इलेक्ट्रॉनिक रूप में संरक्षण तथा संचार के आधुनिक माध्यमों ने न्यायिक कार्यप्रणाली को अधिक तेज और प्रभावी बनाया है। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांत-निष्पक्षता, पारदर्शिता, सुलभता और तर्कसंगत निर्णय हमेशा सर्वोपरि रहने चाहिए। तकनीक न्यायिक प्रक्रिया में सहायक हो सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय और जिम्मेदारी हमेशा न्यायाधीश की ही रहेगी। तकनीक ने प्रक्रियाओं को सरल बनाया है और देरी को कम करने में मदद की है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि सीमित संसाधनों वाले नागरिकों के लिए न्याय तक पहुँच बाधित न हो। न्याय व्यवस्था समावेशी होनी चाहिए और समाज का कोई भी वर्ग तकनीकी बदलावों के कारण न्याय से वंचित महसूस न करे।

 

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