चंडीगढ़। विजयोत्सव के महापर्व पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्थापना के शताब्दी वर्ष (100 साल) पूरे कर लिए हैं। अब संघ ने राष्ट्र सेवा के नए संकल्प के साथ आगामी शताब्दी वर्ष की ओर पग बढ़ाया है। यह पग न केवल भारत की वसुधैव कुटुंब यानि परिवार संस्कृति और मूल्यों को मजबूती देगा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2047 के विकसित भारत में संघ का हर योगदान, देश की ऊर्जा बढ़ाएगा, देश को प्रेरित करेगा।
वर्ष 1925 में धर्म, साहस और सत्य की विजय का पर्व दशहरे पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का उद्भव हुआ। संघ बिना भारत अधूरा है, क्योंकि यह हिंदुत्व की ज्योति है और राष्ट्र की प्राणशक्ति है। एक शताब्दी वर्ष में संघ की यात्रा, संघर्ष, बलिदान, समर्पण, त्याग और तप की प्रेरणा पुंज रही है। आपदाओं में सेवा से लेकर वैश्विक योगदान तक, संघ की शक्ति राष्ट्र को मजबूत करती है। हिंदुत्व की रक्षा में संघ की अनिवार्यता निर्विवाद है - यह हिंदुओं को जागृत कर, संस्कृति पर गर्व सिखाता है।
राष्ट्र निर्माण का महान उद्देश्य, व्यक्ति निर्माण का स्पष्ट पथ और शाखा जैसी सरल, जीवंत कार्यपद्धति यही संघ की सौ वर्षों की यात्रा का आधार बने। इन्हीं स्तंभों पर खड़े होकर संघ ने लाखों स्वयंसेवकों को गढ़ा, जो विभिन्न क्षेत्रों में देश को आगे बढ़ा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने गठन के साथ राष्ट्र निर्माण का विराट उद्देश्य लेकर चला। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संघ ने व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण रास्ता चुना और इस चलने के लिए जो कार्यपद्धति चुनी वो थी नित्य-नियमित चलने वाली शाखाएं। संघ शाखा का मैदान, एक ऐसी प्रेरणा भूमि है, जहां से स्वयंसेवक की अहम् से वयं की यात्रा शुरू होती है। संघ की शाखाएं व्यक्ति निर्माण की यज्ञवेदी हैं।
हिंदुत्व, राष्ट्र भक्ति, बलिदान, समर्पण और त्याग-तप का प्रेरणा पुंज है संघ
संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर विशेष
आरएसएस का जन्म उस समय हुआ जब भारत स्वतंत्रता संग्राम के दौर से गुजर रहा था। विदेशी शासन, सामाजिक बिखराव, जातिगत भेदभाव और राष्ट्रवाद की कमजोर होती भावना देश के लिए चिंता का विषय थे। तब वर्ष 1925 में महाराष्ट्र के नागपुर में परम पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। डॉ. हेडगेवार ने महसूस किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, समाज को आत्मबल, एकता और राष्ट्रभक्ति के संस्कारों से ओतप्रोत करना भी जरूरी है। उनका उद्देश्य एक ऐसा संगठन बनाना था जो जाति, धर्म और भाषा से ऊपर उठकर राष्ट्र को सर्वोपरि माने। संघ की शाखाओं के माध्यम से अनुशासन, चरित्र निर्माण, सेवा और राष्ट्रप्रेम की भावना को विकसित करने का प्रयास किया गया।
संघ ने विचार शक्ति से राष्ट्र को नई दिशा दी है। संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने पर पूज्य सरसंघचालक मोहनराव भागवत के उद्बोधन में अतीत से लेकर भविष्य तक का पूरा विजन स्पष्ट झलकता है। असंख्य स्वयंसेवकों ने निष्काम भाव से अपने जीवन को संघ के यज्ञ में स्वयं को आहूत किया और यह राष्ट्र अनुष्ठान भारत माता के निमित्त एक शताब्दी पूर्ण होने पर भी अनवरत और अविरल जारी है। संघ एक दिव्य शक्ति के रूप में अनन्तकाल तक स्थापित, सक्रिय और सक्षम रहेगा, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, अपितु शपथ से शुद्ध सत्य है। संघ का प्रत्येक स्वयं सेवक इसलिए इसे ईश्वरीय कार्य मानता है। इसी भाव से ध्वज प्रणाम करते आ रहे लाखों स्वयंसेवक इस महान संगठन के प्राण और सनातन उसकी आत्मा हैं।
पूज्य सर संघ संचालक आदरणीय मोहन राव भागवत द्वारा व्याख्यानमाला के उद्बोधन एवं जिज्ञासा समाधान सत्र में संघ को क्या करना-दायित्व बोध, नागरिक कर्तव्य, सामाजिक समरसता, विभिन्न धर्म संप्रदाय के लोगों में सद्भाव एवं संघ हिंदू जागरण करता है और हिंदुओं का संगठन है, यह मजबूती से रखा है।
यह शताब्दी वर्ष केवल एक संगठन की उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना के सौ वर्षों की यात्रा का भी प्रतीक है। इस युग में संघ उसी अनादि राष्ट्र चेतना का पुण्य अवतार है। हमारी पीढ़ी के स्वयंसेवकों का सौभाग्य है कि हमें संघ के शताब्दी वर्ष जैसा महान अवसर देखने मिल रहा है।
संघ के पंच परिवर्तन, स्व बोध, सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, नागरिक शिष्टाचार और पर्यावरण ये संकल्प हर स्वयंसेवक के लिए देश के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को परास्त करने की बहुत बड़ी प्रेरणा हैं। हर आपदा में संघ के स्वयंसेवक अपने सीमित संसाधनों के साथ सबसे आगे खड़े रहते रहे। यह केवल राहत नहीं थी, यह राष्ट्र की आत्मा को संबल देने का कार्य था। खुद कष्ट उठाकर दूसरों के दुख हरना ये हर स्वयंसेवक की पहचान है। आज भी प्राकृतिक आपदा में हर जगह स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचने वालों में से एक रहते हैं। समाज में सदियों से घर कर चुकी जो बीमारियां हैं, जो ऊंच-नीच की भावना है, जो कुप्रथाएं हैं, ये हिन्दू समाज की बहुत बड़ी चुनौती रही हैं। ये एक ऐसी गंभीर चिंता है, जिस पर संघ लगातार काम करता रहा है। डॉक्टर साहब से लेकर आज तक, संघ की हर महान विभूति ने, हर सर-संघचालक ने भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। परम पूज्य गुरु जी ने निरंतर "न हिन्दू पतितो भवेत्’ की भावना को आगे बढ़ाया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक परम पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए संघ की 100 वर्षों की इस गौरवमयी यात्रा की स्मृति में भारत सरकार ने विशेष डाक टिकट और स्मृति सिक्के भी जारी किए है, जो दर्शाता है कि आरएसएस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आत्मनिर्भर भारत और 2047 में विकसित भारत में देश की ऊर्जा बढ़ाएगा। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 79वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से संघ को "दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन" बताया और देशवासियों को संघ की सौ साल की भव्य, प्रेरणादायक और समर्पित यात्रा के बारे में याद दिलाया। दस दशकों में आरएसएस ने भारत की सामाजिक बुनियाद को मजबूत किया है, उसकी संप्रभुता की रक्षा की है, कमजोर वर्गों को सशक्त बनाया है और भारतीय सभ्यता के मूल्यों को संजोए रखा है। वर्तमान में आरएसएस नि:स्वार्थ सेवा का जीवंत प्रतीक बन गया है। आरएसएस आगामी शताब्दी वर्ष में देश की युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और राष्ट्र निर्माण के साथ जोडऩे में अहम भूमिका निभाएगा।