पंचकूला, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सेक्टर-1, पंचकूला में मंगलवार को भारतीय साहित्य में स्त्री चेतना के स्वर विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में प्रख्यात साहित्यकार और बाबा साहब आंबेडकर शिक्षा विश्वविद्यालय, कोलकाता की कुलपति डॉ. सोमा बंदोपाध्याय बतौर मुख्य वक्ता उपस्थिति रहीं, जिन्होंने भारतीय साहित्य में स्त्री स्वर के विविध आयामों और उसकी सामाजिक प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यशाला का आयोजन कॉलेज के एनएसएस प्रकोष्ठ और प्लेसमेंट प्रकोष्ठ के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
साहित्य में स्त्री चेतना ही समाज परिवर्तन की धारा: डॉ सोमा बंदोपाध्याय
डॉ. बंदोपाध्याय ने कहा कि भारतीय साहित्य में स्त्री केवल पात्र भर नहीं रही, बल्कि समाज परिवर्तन की धारा का प्रतीक रही है। प्राचीन काव्य से लेकर आधुनिक साहित्य तक स्त्री की पीड़ा, संघर्ष, सपने और आकांक्षाएँ निरंतर व्यक्त होती रही हैं। उन्होंने मीराबाई, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम और मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इनकी रचनाओं ने स्त्री विमर्श को साहित्यिक दायरे से आगे बढ़ाकर सामाजिक चेतना का अंग बनाया। महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. शैलजा छाबड़ा ने कहा कि साहित्य में स्त्री चेतना विद्यार्थियों को संवेदनशीलता, सहयोग और समानता जैसे मानवीय मूल्यों से जोड़ती है। यह व्याख्यान छात्र-छात्राओं को साहित्य के माध्यम से समाज के गहरे सरोकारों को समझने का अवसर देता है।
कॉलेज प्लेसमेंट प्रकोष्ठ की संयोजक प्रो. चित्रा तंवर ने कहा कि यह व्याख्यान युवाओं को लैंगिक समानता और स्त्री की रचनात्मक शक्ति को समझने की दिशा में प्रेरित करता है। वहीं, कॉलेज के एनएसएस कार्यक्रम अधिकारी डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि साहित्य में स्त्री चेतना सेवा, संवेदना और संघर्ष की प्रेरणा देती है तथा विद्यार्थियों को समाज में सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए तैयार करती है।
कार्यशाला में पंचकूला के राजकीय कन्या महाविद्यालय, सेक्टर -14 से प्रो. अलका शर्मा समेत महाविद्यालय के अनेक संकाय सदस्य और एनएसएस स्वयंसेवकों समेत बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे। कार्यशाला के अंत में विद्यार्थियों ने भी सक्रिय भागीदारी करते हुए स्त्री विमर्श की वर्तमान प्रासंगिकता पर अपने विचार साझा किए। यह कार्यशाला न केवल साहित्यिक दृष्टि से सार्थक रही, बल्कि समाज में समानता और संवेदनशीलता की दिशा में भी एक प्रभावी पहल साबित हुई।