पाकिस्तान | पाकिस्तान विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मुमताज जहरा बलूच ने आरोप लगाया कि भारत ने जूनागढ़ पर अवैध कब्जा कर रखा है। जूनागढ़ गुजरात का एक शहर है जिसे जनमत संग्रह के तहत 1948 में भारत में मिला लिया गया था।
पाकिस्तान चैनल जियो टीवी के मुताबिक साप्ताहिक ब्रीफिंक के दौरान प्रवक्ता बलूच ने कहा कि जूनागढ़ के बारे में पाकिस्तान का रूख हमेशा से साफ है। जूनागढ़ ऐतिहासिक और कानूनी तौर पर पाकिस्तान का हिस्सा है। इस पर भारत का कब्जा संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन है।
यह कश्मीर जैसा अनसुलझा मुद्दा, PAK इसे अपने नक्शे में दिखा चुका
प्रवक्ता बलूच ने कहा कि पाकिस्तान, जूनागढ़ को जम्मू-कश्मीर की तरह अनसुलझा मुद्दा मानता है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान हमेशा राजनीतिक और कूटनीतिक मंचों पर जूनागढ़ मुद्दे को उठाता रहा है और इसका शांतिपूर्ण समाधान चाहता है।
पाकिस्तान ने जूनागढ़ को अपने नक्शे में दिखाया
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब पाकिस्तान ने जूनागढ़ को अपना हिस्सा बताया है। अगस्त 2020 में भी पाकिस्तान ने जब नया नक्शा जारी किया था तो जूनागढ़ को पाकिस्तान का हिस्सा बताया था। इसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा था कि पाकिस्तान की यह कोशिश फिजूल है।
जूनागढ़ को पाकिस्तान अपना हिस्सा क्यों मानता है
1947 में भारत का बंटवारा हो चुका था। अंग्रेजी हुकूमत ने इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 लागू किया था। इसके तहत लैप्स ऑफ पैरामाउंसी ऑप्शन दिया गया था। इससे 565 रियासतों के राजा अपनी रियासत को भारत या पाकिस्तान से जोड़ सकते थे या फिर अपना स्वतंत्र राष्ट्र बना सकते थे।
15 अगस्त 1947 तक ज्यादातर रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल हो चुकी थीं, लेकिन तीन रियासतों के विलय का मामला उलझा हुआ था। ये तीन रियासतें- जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद थीं।
तीनों में हैदराबाद और जूनागढ़ की स्थिति एक जैसी थी। 80% से 85% आबादी हिंदू थी और शासक मुस्लिम, लेकिन कश्मीर में परिस्थिति उलट थी। वहां राजा हिंदू थे और तीन-चौथाई कश्मीरी मुसलमान थे। देखा जाए तो मोहम्मद अली जिन्ना की ‘टू नेशन थिअरी’ के हिसाब से जूनागढ़ का विलय भारत में होना चाहिए था।
15 अगस्त 1947 को जब भारत के लोग आजादी का जश्न मना रहे थे, तब जूनागढ़ के लोग कंफ्यूजन में थे, क्योंकि इसी दिन जूनागढ़ के नवाब महाबत खान ने पाकिस्तान के साथ जाने का ऐलान कर दिया था। यानी साजिश रची जा चुकी थी।
जूनागढ़ के दीवान शाहनवाज भुट्टो की इसमें मुख्य भूमिका रही थी। कहा जाता है कि नवाब महाबत खान भारत के साथ रहना चाहते थे, लेकिन शाहनवाज ने उनकी बात नहीं मानी। शाहनवाज उस वक्त सिंध से मुस्लिम लीग के नेता थे और मोहम्मद अली जिन्ना के करीबी थे।
'वॉर एंड पीस इन मॉडर्न इंडिया' में श्रीनाथ राघवन लिखते हैं कि शाहनवाज जुलाई 1947 में जिन्ना से मिलते हैं। जिन्ना बंटवारे की तारीख तक शाहनवाज से शांति बनाए रखने को कहते हैं। शाहनवाज ने जिन्ना की बात मानते हुए ऐसा ही किया, लेकिन जैसे ही 15 अगस्त 1947 की तारीख आई, शाहनवाज ने ऐलान किया कि जूनागढ़ का विलय पाकिस्तान में होगा।
यहां पर लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह को भी दरकिनार किया गया, क्योंकि जूनागढ़ जमीनी रूप से भारत से जुड़ा था और पाकिस्तान जाने के लिए समंदर पार करना पड़ता।
सरदार पटेल को लगा कि पाकिस्तान जूनागढ़ का विलय नहीं करेगा
शुरुआत में पटेल को लगा कि पाकिस्तान जूनागढ़ का विलय नहीं करेगा, लेकिन पटेल गलत साबित हुए। एक महीने बाद 16 सितंबर 1947 को पाकिस्तान ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा कर दी। इसका भारत ने विरोध भी किया।
इधर, पटेल ने पाकिस्तान को एक बार फिर से इस पर विचार करने के लिए कहा। साथ ही जनमत संग्रह कराने की पेशकश भी, लेकिन पाकिस्तान ने इसे नकार दिया।
इसके बाद 19 सितंबर 1947 को सरदार पटेल भारत सरकार के रजवाड़ा खाते के सचिव वीपी मेनन को जूनागढ़ भेजते हैं, लेकिन मेनन को नवाब से नहीं मिलने दिया गया। साथ ही नवाब की ओर से शाहनवाज ने उनसे गोल-मोल तरीके से बात की। यानी कुछ भी साफ नहीं किया।